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Sunday, December 16, 2012

कहानी बन कर ...


ये सफर काट दो मौजों की रवानी बन कर
बीत जायेगी उमर एक कहानी बन कर

हसीन मयकदा-ए-इश्क मस्तियाँ-ऒ-शबाब
सब एक बार ही आते है जवानी बन कर

रुखसत-ए-यार के ग़म को भी कहाँ तक सोचें
वो भी कब तक रहेगा आँख का पानी बन कर

इस कदर गम कि घटाओं से न घबरा प्यारे
ये भी बरसेंगे तो बह जायेंगे पानी बन कर

ज़िन्दगी चिलचिलाती धूप के सिवा क्या है
प्यार आता है मगर शाम सुहानी बन कर

आज दुनिया को मेरे जज़्बों की परवाह नहीं
                              ख़ाक हो जाऊँ तो ढूँढेगी दीवानी बन कर........

Wednesday, December 5, 2012

यक़ीं कीजे, ये मैं ही हूँ, जरा फोटो पुरानी है...

कभी लिखता नहीं दरिया, फ़क़त कहता ज़बानी है
कि दूजा नाम जीवन का रवानी है, रवानी है

बड़ी हैरत में डूबी आजकल बच्चों की नानी है
कहानी की किताबों में न राजा है, न रानी है

कहीं जब आस्माँ से रात चुपके से उतर आये
परिंदा घर को चल देता, समझ लेता निशानी है

कहाँ जायें, किधर जायें, समझ में कुछ नहीं आता
कि ऐसे मोड़ पर लाती हमें क्यों जिंदगानी है

बहुत सुंदर से इस एक्वेरियम को गौर से देखो
जो इसमें कैद है मछली,क्या वो भी जल की रानी है

घनेरे बाल, मूँछें और चेहरे पर चमक थोड़ी
यक़ीं कीजे, ये मैं ही हूँ, जरा फोटो पुरानी है

- कुमार विनोद

Tuesday, September 11, 2012

मुझे अपने शौक़ का सामां बना रखा है...

जिसे  मैंने अपने दिल  में मेहमां  बना रखा है 
उसने मुझे अपने शौक़ का सामां बना रखा है
[शौक़ का सामां = an item of pleasure ]
 
 गुलपोश रहा करता था सेहन-ए-चमन मेरा  
 गुलन्दाम नें उस चमन को बियांबां बना रखा है
[गुलपोश = covered with flowers , सेहन-ए-चमन = garden in the backyard, गुलन्दाम = beauty, बियांबां  = deserted]
 
यास-ओ-उम्मीद के दरमियाँ  रक्साँ  ज़िन्दगी
जुस्तुजू में मैंने भी इस रक्स को रवां बना रखा है

[ यास-ओ-उम्मीद = dispair and hope, दरमियाँ = between,रक्साँ  = dancing,  जुस्तुजू = In quest, रक्स = dance, रवां = continuous]
 
मैं मुहब्बत  में उसके हर तक्सीर को भूल जाता हूँ  
वो समझते हैं की  'मुज़्तरिब' को नादाँ बना रखा है
[तक्सीर = mistake, नादाँ = ignorant/naive ]
 
- 'મુજ્તરિબ'

Wednesday, August 1, 2012

कुछ लम्हे ऐसे होते है …..!

कुछ लम्हे ऐसे होते है
वो साथ हमेशा होते है
जब मंज़र चुप हो जाते है
वो दिल से बाते करते है

मसलन वो छोटा लम्हा
वो नानी का बुढ़ा कमरा
कमरे में बिखरी सी हुई
वो परियां और शैतान की बातें
रजाई में सुनते कट थी
शर्दी की वो लम्बी रातें

आज में उसी चार पाय पे तनहा हो कर बैठा हूँ
रजाइ के ज़रिये से जब उन लम्हों को सहलाता हूँ
वो सारे लम्हे एक साथ इस कमरे में आ जाते है
राजा ,रानी ,भालू ,शेर अपने साथ वो लाते हे
आज भी जब शैतान के डर से राज कुमारी रोती है
कमरे में बैठे बैठे मेरी आँखों को भिगोती है
ये लम्हे कभी ना मरते है ,
ये तो राजकुमार से होते है
हमेशा जिंदा रहते है
जब मंज़र चुप हो जाते है
वो दिल से बाते करते है
कुछ लम्हे ऐसे होते है….!

याद अभी तक है मुजको वो भीगा भीगा सा लम्हा
रात को छत पे आना उसका और बालो को बिखराती हवा
हवा और दुपट्टे के बिच में सरगोशी सी होती थी
वो कुछ भी ना कहते थी और लाखो बाते होती थी
वो दिल की बातो का होठो पे आते आते रुक जाना
नजरो का मिलते ही फिर शर्मा के उनका झुक जाना
कसम है उन नजारों की लम्हों को फिर से जीना है
वक्त के ज़रिये से उखड़े रिश्ते को फिर से सीना है
लेकिन इन बेहते लम्हों को हाथो में कैसे कैद करू
जैसे में मुट्ठी बंध करू वे बन कर रेत सरकते है
वो साथ हमेशा रहते है
जब मंज़र चुप हो जाते है
वो दिल से बाते करते है
कुछ लम्हे ऐसे होते है….!

इन छोटे मोटे लम्हों में कई फ़साने होते है
कहीं ख़ुशी से हसते है तो कभी वो गम में रोते है
ये लम्हे अजीब होते है जाने कहाँ से आते है ?
वक्त के पाबन्द होते है आते ही चले जाते है
लेकिन चंद लम्हे होते है जो दिल में घर कर जाते है
गर्दिशो के दौर में हम उन लम्हों को जी लेते है
जाम बना कर अक्सर हम उन लम्हों को पी लेते है
ये लम्हे ही तो होते है हम सबको ज़िंदा रखते है
वो साथ हमेशा रहते है
जब मंज़र चुप हो जाते हे
वो दिल से बाते करते है
कुछ लम्हे ऐसे होते है …..!

- વિરલ રાચ્છ

From - http://tahuko.com/

Thank You Tahuko .... for posting this wonderful Nazam ....

Wednesday, September 28, 2011

हम चिरागों की तरह जलते रहे ...



तकाजा है वक्त का तूफां से जूझो
कब तक किनारे किनारे चलोगे ...

-"?"


बिछडा है जो ईक बार मिलते नही देखा,
ईस जख्म को हमने कभी सिलते नही देखा ...
- परवीन शाकिर


राजे दिल कहा जिसे दोस्त समझ कर
ए जफर उसी को हमने जान का दुश्मन पाया ..
- बहादुरशाह जफर

कैसे कैसे हादसे सह्ते रहे
हम चिरागों की तरह जलते रहे ...
-"?"